Tuesday, June 2, 2009

डंके की चोट पर जनता का पैगाम

  • राजनीति करनी है तो गुंडागर्दी से बाज आओ।
  • वोट लेना है तो काम करो।

  • क्षेत्रिय क्षत्रपों को कहा, 'दलाली बन्द करो`।

इस लोकसभा चुनाव में बिहार के मतदाताओं ने राजनीतिज्ञों को कुछ साफ संकेत दिए हैं। आम जन को बहला फुसला कर, आपस में लड़ा कर वोट झीटने वाले नेताओं के दिन लद गए। आज का मतदाता विशेष रूप से युवा, नेताओं की बाजीगरी और इनके दाव-पेंच को भली भॉति समझती है। बिहार की जनता ने यह साफ कर दिया है कि राजनीति की विसात पर नेताओं के पासे फेंकने की कलाबाजी अब ज्यादे दिन नहीं चलने वाली। जनता ने इस बार के चुनाव में तीन स्पष्ट संकेत नेताओं को दिए हैं-


राजनीति करनी है तो गुंडागर्दी से बाज आओ।

लोक सभा के चुनावी प रिणाम इस दृष्टि से भारतीय राजनीति के लिए एक शुभ संकेत लेकर आए हैं कि बाहुबलिओंके दिन लद गए। वोट लुटेरों को जनता ने इस बार अंगूठा दिखा दिया। जनतंत्र में मतों का अपहरण अत्यंत घातक रहा है। आम जन को भय से आक्रांत कर विगत दशकों में बाहुबलिओं ने जिस प्रकार मत लूट कर जनतंत्र का मखौल उड़ाया और अपना वर्चस्व स्थापित किया उससे ऐसा प्रतीत हो रहा था कि बिहार में प्रजातंत्र का अपहरण हो गया है। पार्टियां बाहुबलियों को अधिक से अधिक टिकट देने लगी क्योंकि भय के आगोश में वे विजयी हो जाया करते थे। भला हो के० जे० राव जी का जिन्हों ने अपनी निष्ठा, तत्परता और पराक्रम से संविधान सम्मत प्रभावों का उपयोग कर जनमत को सुरक्षा प्रदान की और उसे अपहृत होने से बचाया। बाद के दिनों में जब न्यायिक प्रक्रिया तेज करते हुए प्रशासन ने इन बाहुबली नेताओं पर सिकंजा कसना प्रारंभ किया तो पैंतरे बदलते हुए इन बाहुबलियों ने अपने परिवार के अन्य सदस्यों के द्वारा सत्ता में काबिज हो अपना प्रभाव बनाने की चेष्टा की। परन्तु जनता ने उन्हें भी नकारते हुए साफ कह दिया कि राजनीति करनी है तो गुंडागर्दी से बाज आओ।
वोट लेना है तो काम करो।
यह दूसरा महत्वपूर्ण फरमान बिहार की जनता ने इस चुनाव में नेताओ को सुनाया है। बिहार केलिए यह एक मिथक बन गया था कि बिहार के लोगों को विकास से कोई मतलब नहीं है। विकास उनके लिए बेमानी है। लालू प्रसाद ने तो कई बार खुले तौर पर वक्तव्य जारी कर कहा कि वोट का विकास से कोई लेना देना नहीं। विकास के नाम पर वोट नहीं मिलता। इस बार चुनाव में बिहार के लोगों ने इस मिथक को तोड़ कर रख दिया। बिहार की जनता ने साफ कहा कि हमें भी सड़क, बिजली, पानी चाहिए। काम करोगे तो वोट दूँगा। काम नहीं करोगे तो केवल भाषणबाजी पर हाम वोट नहीं देंगे। कुछ गाँवों के लोगों ने तो विकास की मांग को लेकर मतदान का बहिष्कार तक कर दिया। विकास के लिए तो यह एक अच्छी परम्परा की शुरुआत है किन्तु मतदान का बहिष्कार कतई अच्छी बात नहीं कही जा सकती। फिर भी विकास के लिए जनता की भूख सराहनीय है।
वस्तुत: जाति, वर्ग में विभाजित आम मतदाता अपना यह संदेश नहीं दे पाती थी। इस बार के चुनाव में विकास के लिए मत देकर जनता ने अपनी बात कह दी। उसने कहा कि अन्य सभी राजनीतिक सोच के साथ-साथ विकास भी हमारे लिए अहम मुद्दा है।
क्षेत्रिय क्षत्रपों को कहा, 'दलाली बन्द करो`।

तीसरा महत्वपूर्ण फरमान जो बिहार की जनता ने नेताओं केे नाम जारी किया वो यह कि बहुत हुआ, अब हम अपने मतों के बल पर तुम्हें केन्द्र में दलाली नहीं करने देेंगे। यह संदेश जनता ने क्षेत्रीय दलों को नकार कर राष्ट्रीय पार्टियों के हक में अपना मत देकर स्पष्ट कर दिया है। विगत चुनावों में जनता ने यह महसूस किया कि क्षेत्रिय पार्टियाँ उनसे मत लेकर प्रांत और राज्य के हक में उस शक्ति का प्रयोग नहीं करते बल्कि जनता के द्वारा दिए गए उस शक्ति का प्रयोग वे निजी स्वार्थ के लिए बाँट-बखरे की राजनीति में करते हैं।
इस बार जनता ने बड़े साफ तौर पर कहा है कि अपने मतों का उपयोग हम तुम्हें दलाली के लिए नहीं करने देंगे। दूसरा यह कि क्षेत्रिय पार्टियों के सशक्त होने से जातिवाद, अवसरवाद को बढ़ावा
मिलता है और राष्ट्रीय हित में ठोस निर्णय नहीं हो पाता। राष्ट्रीय नीतियों के अनुपालन में क्षेत्रिय पार्टियाँ अपने स्वार्थ के लिए बाधा उत्पन्न करती हैं। यही कारण है कि बिहार की अधिकांश जनता ने कांग्रेस के नेतृत्व मंे बनी यू०पी०ए०, तथा भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में बनी एन०डी०ए० के पक्ष में अपने मताधिकार का प्रयोग किया।
निश्चय ही बिहार के मतदाताओं ने इस बार जिस तरह अपने विवेक के आधार पर मतदान किया है यदि यह परम्परा जारी रही और यदि क्षेत्रिय पार्टियों के कलाबाज नेताओं के बहकाबे में, बाँटो और राज करो की नीति में वे नहीं उलझे तो बिहार की प्रगति को कोई रोक नहीं सकता। निश्चय ही इससे राष्ट्रीय एकता और अखंडता मजबूत होगी। मैं विशेष रूप से बिहार के युवा मतदाताओं को धन्यवाद देता हूं कि उन्होंने जिस सुलझे सोच, बौद्धिकता और विवेक के साथ अपने मताधिकार का प्रयोग किया है वह भावी राजनीति को स्वस्थ्य एवं सशक्त दिशा प्रदान करेगी।


Monday, January 26, 2009

पृथवी थियेटर : दादा के सपने को साकार करती संजना कपूर`

हिन्दी सिनेमा के पितामह पृथवी राजकपूर के शताब्दी वर्ष के अवसर पर पृथ्वी थियेटर की संचालिका संजना कपूर ने पृथ्वी उत्सव मनाने में कोई को कसर नहीं छोड़ा। इस ऐतिहासिक थियेटर की संचालिका एवं पृथवी राज कपूर की पौत्री संजना ने रंगकर्म के फलक को एक नवीन आयाम देने की चेष्टा की है। १९९३ में जब से संजना ने पूर्णरूप से पृथ्वी थियेटर की जिम्मेवारी ली उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। अपने दादा के सपने, पिता शशिकपूर एवं माघ् जेनीफर के अरमान को अत्मसात कर संजना ने जैसे पृथ्वी थियेटर को अपने सांसों में बसा लिया है। वेश भूषा, सजने-संवरने और रंग-ढ़ंग से बिल्कुल साधारण, मेहनती लड़की की तरह दिखनेवाली संजना एक सेलिब्रीटी है यह सहज ही नहीं कोई भांप सकता है। सुरू से ही संजना की आत्मिक अभिलाशा थी कि वह अपने पिता जेफरी केण्डाल की तरह चलित रंगशाला(जतंअमससपदह जीमंजतम) मे काम करे। लिकिन भारत में वैसे थिएटर का कोई भविष्य नहीं था। उसने १९८८ मेें नसिरुघीन शाह के साथ हीरो हीरालाल में काम किया किन्तु उसे शीघ्र ही पता चल गया कि सिनेमा में काम करना उसकी मनोवृघि के अनुकूल नहीं है। सिनेमा से मोह भंग होने के बाद संजना ने लगभग साढ़े तीन वर्षों तक स्टार टेलीवीजन के 'अमूल ईण्डिया सो` का संचालन करने के बाद पृथवी थियेटर को ही अपने जीवन का उद्येश्य बना लिया। संजना के अनुसार उसके जीवन का सबसे अच्छा अभिनय पृथवी थिएटर में जेफरी कण्डाल के निर्देशन में 'गैसलाईट` शीर्षक अंग्रेजी नाटक में ही हुआ है। १९८४ मे संजना की माघ् जेनीफर के निधन के बाद संजना के भाई कुणाल और फिरोज खान के उपर थिएटर का जिम्मा आ गया । संजना कहती हैं कि जब उन्हों ने थिएटर के काम में हिस्सा लेना शुरू किया तब वो फिरोजखान के साथ नाट्य उत्सव आयोजित करना सीखा करती थीं। आज के इस भागदौड़ की जिंदगी, सिनेमा, टेलीवीजन और कम्पयुटर के युग में भी वह थियेटर की अवधारणा को अपने पूरे मनोयोग, संकल्प, श्रम और धैर्य के साथ स्वरूप देने में लगी है। बाल कलाकारों के लिए बाल थियेटर, प्रयोगात्मक रंगशाला (मगचमतपउमदजंस जीमंजतम) तथा नाट्य महोत्सव ( जीमंजतम मिेजपअंस), पृथवी गैलरी आदि के साथ-साथ कई रूपों मंे इसका विस्तार हुआ है। दो सौ दर्शकों के बैठने की व्यवस्था के साथ- साथ यह थियेटर साल में लगभग तीन सौ दिन बुक रहता है तथा प्रतिवर्ष तकरीबन ४०० प्रस्तुति आयोजित करता है। आम तौर पर अस्सी प्रतिशत टिकट बिघी के साथ साल में लगभग ६५००० दर्शकों के पास कलात्मक प्रस्तुति पहुघ्चाता है। भारतीय कला जगत को विश्व फलक पर सम्मानित स्थान दिलाने से लेकर रंगकर्म की संस्कृति में नूतन प्रयोग करते हुए भी उसकी थाती को अक्षुण्ण रखने में संजना अहम भूमिका निभाती रही है। संजना पृथ्वी थियेटर केमाध्यम से रंगकर्म को आंदोलन का स्वरूप देने में सफल रही हंै। इस क्रम में उन्होंने पृथ्वी थियेटर को स्थानीय थियेटरों यथा कलकघा के 'सेगुल` (ैमंहनसस) चेन्नई के 'मेजिक लालटेन`(डंहपब स्ंदजमतद) दिल्ली के 'हैबिटेट`(भ्ंइपजंजम) बंगलोर के 'रंगशंकर` और पूने के रंगवर्धन आदि को संबद्ध कर थियेटर संस्कृति के विकास को एक नया आयाम दिया है। पृथवी महोत्सव के साथ स्थानीय थियेटर को जोड़ना तथा हिन्दी सहित विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं यथा मराठी, गुजराती, बंगाली आदि से जुड़कर पूरे भारत में रंगकर्म का माहौल तैयार करना सहज नहीं था। यह रातों रात संभव भी नहीं हुआ। वर्षो की कड़ी मेहनत के बाद यह हो सका है। हिन्दी भाषा-भाषियों के लिए भारतीय सिनेमा उद्योग की राजधानी बंबई में एक छोटा सा नाट्य दीर्घा स्थापित करने के पृथ्वी राजकपूर के सपने को साकार करने के लिए उनके सबसे छोटे पुत्र शशिकपूर और पुत्रवधू जेनीफर ने पिता के मृत्यु के छ: वर्ष बाद ५नवंबर १९७८ में जूहू में पृथ्वी थियेटर के नाम से एक ऐसे कला संस्था की स्थपना की जो कला के क्षेत्र में मील का पत्थर सिद्ध हुआ है। इस संस्था की स्थापना के पीछे उनका दद्येश्य था एक ऐसे स्थल का निर्माण जहाघ् नए कलाकारों को विकसित होने का अवसर मिले, कलाकार एवं कलाप्रेमी, रंगकर्मी के बीच सीधा संपर्क स्थापित हो। १९४४ में जिस चलित रंगशाला (उवइपसम जीमंजतम बवउचंदल) का बीजारोपन पृथ्वी राजकपूर ने कलाकरों, लेखकों, तकनीकी कर्मियों सहित१५० समर्पित कलाप्रेमियों की टोली लेकर की थी वह आज अपने संपन्न स्वरूप के साथ विश्व कला परिदृश्य में अपना पृथक स्थान रखता है और निश्चय ही इस सब के पीछे संजना के लगन और श्रम का फल है। यू तो कई वर्षों से संजना पृथ्वी उत्सव मनाती रही ंहैं पर इस वर्ष उन्हों ने विशेष रूप से कई महीनों तक श्रमसाध्य कार्य करते हुए पृथ्वी राज कपूर एवं हिन्दी सिनेमा के सुरुआती दौर तथा रंगकर्म पर उनके प्रभाव को विषय बनाकर शोध पूर्ण कार्य भी किया। इस अवसर पर उस महान कलाकार की नाट्य प्रस्तुतियों पर एक विशिष्ट प्रदर्शनी आयेाजित की गयी । इस प्रदर्शनी में मुख्य रूप से कालिकादास की 'संकुतला`, सामाजिक राजनैतिक प्रस्तुति 'दीवार`, के साथ साथ 'पठान`,'गघर`, 'आहूति`, 'कलाकार`, 'पैसा`, सहित 'किशान` की प्रस्तुति की गयी। ये कुछ ऐसी नाट्य प्रस्तुति थी जिसमें पृथवी राजकपूर ने स्वयं मुख्य भूमिका निभायी थी। इस अवसर पर हबीब तनवीर की नाट्य प्रस्तुति, बंगाल से टैगोर के चयनित नाटकों की प्रस्तुति तथा साथ-साथ नसीरुघीन शाह का काव्यपाठ विशेष आकर्षण था। आज जबकि 'पृथ्वी उत्सव` कला के क्षेत्र में एक मिशाल कायम कर चुकी है फिर भी संजना के लिए अभी और सपनों को साकार करना बाकी है। वेा कहती हैं कि ''मेरा वास्तविक सपना तो उसदिन पूरा होगा जब कलाकरों, उनके विभिन्न पोशाकों और साधन से भरे तथा कलात्मक रंग में रंगे बस में सवार होकर हम सम्पूर्ण भारत वर्ष में अपने नाट्य प्रस्तुतियों के संग भ्रमण करेंगे और मैं समझती हूघ् कि शीघ्र ही हमारा यह सपना भी पूरा होगा।`` पृथवी थियेटर के एक न्यूज लेटर के अनुसार रामू रमानाथन कहते हैं 'वो एक बहुत ही अच्छी आयोजनकर्त्री हैं। प्रत्येक वर्ष पृथवी थियेटर के घ्यिा-कलापों में एक नया आयाम जोड़ती हैं जैसे कुछ वर्ष पूर्व से अंतर्राष्टघीय कठपुतली महोत्सव का आयोजन भी किया जा रहा है। थियेटर केा आमलोगों तक पहुचाने और स्थानीय कला संगठनों में एक नव उर्या के संचार का यह एक सार्थक प्रयास है। संजना कहती हैं कि आज यदि मेरे दादा जिवित होते तो यह देखकर बहुत ही खुश होते कि उनके सपने में आज कितना रंग भर गया है। अपनी आयोजन क्षमता और संकल्पों के साथ संजना आज भी पृथवी थियेटर की संरचनाओं को सुदृढ़ करने में लगी हैं। पृथवी थिएटर में एक सुव्यवस्थ्ति कला पुस्तकालय के निर्माण की भी योजना है जहाघ् कला प्रेमी अपनी जिज्ञासाओं को शांत कर सकें। 'कला देश की सेवा में` जो थियेटर का मूल मंत्र है, उसे चरितार्थ करने के लिए कृत संकल्प दिखती है।

Tuesday, November 4, 2008

'लाज लजाती जिनकी कृति से `

'लाज लजाती जिनकी कृति से `
सियाशत की कुटिल चालों में भावना का स्थान नहीं के बराबर होता है यह तो सुना था किन्तु उसमें एतनी निर्लज्जता होती है, इसकी कल्पना आम जनता शायद ही की हो ।
विचित्र विडम्बना है। समाज में जहाँ एक ओर बलात्कार के लिये फ़ांसी की सजा देने की वकालत की जा रही है वहीं दूसरी ओर मानवता की सभी हदों को पार कर अपनी पुत्र-वधू के साथ दुष्कर्म करने वाले उस नर-पिशाच को फांसी देने की मांग करने के बजाय पीडिता को सरियत का पाठ पढाकर, उसपर बलात्कारी दरिंदे ससुर के साथ पत्नी रूप में रहने के लिए दबाब डाला जा रहा है । पति से सम्बन्ध विच्छेद करने को विवश किया जा रहा है । कितना घृणित है यह न्याय ! कल तक इमराना जिसे पिता के रूप में देखती रहीं होगी, उस विक्षिप्त को पति मान ले और जो कल तक उसका पति रहा, जिससे उसके पाघ्च बच्चे हैं , उसे वह पुत्रवत मान ले ।वाह रे समाज...,वाह रे सभ्यता....,वाह रे संस्कृति, वाह रे धार्मिक ठीकेदार....। समाज में ऐसी विकृति फैलाने वाले को कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए । किन्तु सरकार चुप..., मुख्यमंत्री जी, इस पंचयती में दखल नहीं देना चाहते, कहीं वोट न बिगर जाय । प्रधान मंत्री चुप....,राज्य का मामला है । सघाधारी पार्टी की अध्यक्षा सोनिया गाघ्धी चुप...., आखिर राजनीति है । धिक्कार है उनके महिला होने पर । राजनितिज्ञ बनने से पहले वह एक महिला हैं यह भी भूल गईं । राष्टघ् एक, पर राष्टघ् का कानून दो । देश के कानून के तहत विवाह का उम्र अठारह वर्ष और मॉडल निकाहनामा में पन्द्रह वर्ष । एक के बलात्कारी को फ़ांसी, दूसरी को सरियती नियमों के तहत, उस बलात्कारी ससुर के साथ पत्नी रूप में रहने की नसीहत, पति से संबंध तोर लेने का दबाव। यदि यही है धर्मनिर्पेक्षता, तो ऐसा धर्मनिर्पेक्ष राष्ट्र हमें नहीं चाहिए । जिससे समस्त देश को शर्मसार होना परे। इससे तो पाकिस्तान जैसा इस्लामिक राष्ट्र बेहतर है जहां सरियत के तहत निरपराध घोषित कर छोड़ दिए गए बलात्कारी को वहां के सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी ओर से पहल कर कानून के कठघरे में ला खडा किया ।यह ठीक है कि इस राष्ट्र के सभी नागरिक को धर्म की स्वतंत्रता हो । पर ऐसे मामले धर्म के नहीं होते । यह मामला है, कानून और अपराध का, जिसकी दृष्टि में सभी नागरिक समान हैं, और बिना भेद-भाव के सबके लिए समान कानून हो । यह मामला है नारी की सुरक्षा और सम्मान का । किन्तु यह खेल बन कर रह गया । सघा का खेल ! एक मखौल बन गई इमराना । मीडिया ने भी खूब चटकदार बना कर परोसा और लज्जा तथा ग्लानि से मिट्टी में गड़ती गई वह भारत की महिला । जड़ा सोचिए ! क्या हमारा समाज वास्तव मे सभ्य कहलाने योग्य है ? क्या हमें सुसंस्कृत कहलाने का अधिकार है ? मुझे तो दिनकर की पंक्ति याद आती है-

झड़ गयी पूघ्छ पशुता की,रोमांचक झरना बाकी है ।

बाहर-बाहर हम सघ्वर गएभीतर सजना अभी बाकी है ।`

पाठकों ! अन्तिम पन्ना 'अनुपम उपहार` का एक ऐसा पन्ना है जहाघ् हम माहभर के समाचारों में से कुछ संवेदनशील समाचारों को चुनकार उसपर आम जनता के विचरों एवं दृष्टिकोण का खयाल रखते हुए विवेचन विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं। विश्लेषणकर्ता जाने माने चिंतक,समीक्षक और इस पत्रिका के सम्पादकीय सलाहकार डा० कलानाथ मिश्र हैं । आपसे निवेदन है कि आप भी इस स्तम्भ के साथ अपनी सहभागिता सिथापित करें । हम आपकी प्रतिघ्यिा और विचारों को भी उचित स्थान देंगे

Monday, October 27, 2008

समाचारों के व्यावसायी करण

समाचारों के व्यावसायी करण

भारतीय पत्रकारिता समय शिला पर अबतक अपनी हस्ताक्षर दर्ज करती रही है। स्वतंत्रता संग्राम में समाचार पत्रों के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। अंग्रेजी हुकूमत के शिकंजे के बावजूद भारतीय पत्रकारों ने जनता की भावनाओं को वाणी प्रदान की। तद्युगीन हिन्दी पत्रों के सिंहनाद से देश भक्तों की विशाल सेना अंग्रेजी शासन केा मुहतोर जबाव देने के लिए कमर कस ली थी। 'रोटल एक्ट` के विरोध में गाँधी जी ने ७ अप्रैल १९१९ को बिना रजिस्टे्रसन के ही 'सत्याग्रह` साप्ताहिक का प्रकाशन प्रारम्भ किया। इस प्रकार अंगे्रजी शासन को भी ख्ुाली चुनौती भारतीय पत्रकारिता के माध्यम से ही मिली थी। तब से आज तक भारत में पत्रकारिता केा कमोवेश वही सम्मान मिलता रहा है। जनतंत्र का यह चौथा खम्भा विश्व के किसी भी देश की तुलना में भारत में सशक्त है और निरंतर प्रजातांत्रिक प्रणाली को बल देता रहा है। उस दौर के पत्रकारों को यदि प्रकारिता व्यसनी कहा जाय तो उचित होगा, क्यों कि उन दिनों जो भी इस पेशे को अपनाते थे वे मात्र समर्पण (मीशन) भाव से ही इसका चयन करते थे आर्थिक लाभ तो उनदिनों नगन्य ही था। फिर भी अनेक पत्रकारों ने जनतंत्र और राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानकर आर्थिक तंगी झेलते हुए भी अपना सम्पूर्ण जीवन इसमें लगा दिया। आज भी अनेक पत्रकार अपने उत्तरदायित्व के प्रति सजग और इमानदार हैं। यह ठीक है कि आज गणेश शंकर विद्यार्थी, और बाबूराव पड़ारकर जैसे आदर्श मिलने मुश्किल हंै। यह भी ठीक है कि आज अनेक पत्रकार भ्रष्ट राजनेताओं से लेकर अपराध जगत के सरगनाओं को भी व्यक्तिगत लाभ के कारण महिमा मंडित करने से नहीं चूकते। समाचारों का खरीद-फरोख्त भी कमोवेश चलता रहता है किन्तु यह भी सही है कि इनकी संख्या आज भी अपवाद तक ही सीमित है। आज भी उन्हीं पत्रकारों में से अनेक ऐसे हैं जो व्यक्तिगत लाभ हानि से दूर उन पथ भ्रष्ट पत्रकार जो पीत पत्रकारिता में संलग्न हैं की भी भर्तस्ना करने से नहीं चूकते। आज भी जनता की आवाज को बुलन्द करने का श्रेय पत्रकारिता को ही जाता है। निश्चित रूप से हर पेशे की तरह पत्रकारिता के आदर्श स्थिति में भी समयानुसार हा्रस आया है, किन्तु आज भी यही एक ऐसा जगत है जो अपने विरादरी की खमियों को भी पुरजोड़ ढ़ंग से विरोध करती है और पत्रकारिता की गरिमा को अक्षुण्ण रखने का प्रयास कर रही है। ऐसी स्थिति में पत्रकारिता को सिर्फ व्यावसायिक दृष्टि से देखना अथवा उसके समाचारों को भी पूर्ण रूप से व्यावसायि कर देने का विचार किसी व्यक्ति के दूरगामी दृष्टि की संकीर्णता का ही प्रमाण देता है।टाईम्स ऑफ ईण्डिया के २५ ,फरवरी २००४ के सम्पादकीय पृष्ठ पर एक अंग्रेजी दैनिक के मनोरंजन पृष्ठ की सम्पादक का आलेख प्राकाशित हुआ था जिसमें उन्हों ने समाचारों को भी पूर्ण व्यावसायिक कर दिए जाने की वकालत की है। आलेख पढने के उपरान्त एैसा लगा कि वो कम से कम भारतीय पत्रकारिता जगत की संस्कृति, इतिहास तथा मूल्यों से वाकिफ नहीं हैं और न ही उन्हें भारतीय बौद्धिक समाज का नब्ज ही पता है। पत्र के प्राकाशक और पत्रकार में अंतर करने में उन्हों ने घोर गलती की है। भविष्य की पत्रकारिता को दिशा देने के स्वप्न को सजोने सम्बन्धी अपने लेख में व्यक्त उनके विचार पत्रकारित की मर्यादा के विरुद्ध जान पड़ता है तथा अपनी पीठ थपथपाने में उन्हांेने शीघ्रता की है। इस सन्दर्भ में पत्र में प्रकाशित विज्ञापन तथा लेख अथवा समाचार की मौलिक भिन्नता को स्पष्ट करना आवश्यक है। जहाँ तक समाचार पत्रों में विज्ञापन प्राकाशन का प्रश्न है प्रकाशक विज्ञापन दाताओं को कोई विशेष स्थान विक्रय करता है जिसमें विज्ञापन दाता अपने नीजी उद्येश्यों की पूर्ति हेतु अपना विज्ञापन प्रकाशित कराता है। वहाँ भी प्रकाशन व्यवस्था इस बात का ध्यान रखती है कि उस विज्ञाापन से किसी दूसरे को हानि तो नहीं हो रहा है और जनता जो समाचार पत्र खरीदकर पढ़ती है उसी क्र्रम में प्रकारान्तर से विज्ञापन दाताओं का संदेश भी पढ़ती है। इस प्रकार उनका प्रचार -प्रसार होता हैं। मूल रूप से समाचार पत्रों मेें छपे विभिन्न समाचार, विचार, आलेख, आलोचना महत्वपूर्ण होता है। प्रतिप्ठित समाचारपत्रों के सम्पादकीय को पाठक राजनैतिक, सामाजिक, वैचारिक 'बैरोमीटर` के रूप में देखते हैं। जहाँ एक ओर जनतंत्र में प्रदत्त सूचना के अधिकार को यथार्थ रूप में जनता तक पहुचाने के महती उत्तरदायित्व का निर्वाह समाचार पत्र करते हैं वहीं दूसरी ओर महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर गम्भीर विवेचन के माध्यम से जनता के सोच को भी दिशा प्रदान करते हैं। यही पत्रकारिता की सबसे बड़ी शक्ति है। उक्त सम्पादिका महोदया ने समाचार पत्र की इसी शक्ति के दुरुपयोग की बात अपने उक्त आलेख में की है। किन्तु उन्हें यह समझना चाहिए कि यह शक्ति समाचार पत्र को उसकी विश्वसनीयता के कारण ही प्राप्त होती है। संतुलित तथा अद्यतन समाचार, तटस्थ समाचार विश्लेपण तथा विचारोत्तेजक संपादकीय, गम्भीर तथा विचारपूर्ण आलेख समाचार पत्र को विश्वसनीयता प्रदान करती है और यही विश्वसनीयता उसे लोकप्रिय बनादेती है, जो प्रसार संख्या के रूप में सामने आता है। उक्त निबंध के अनुसार यदि समाचार भी प्रायोजित हों, उसके लिए भी विज्ञापन के तरह पैसे लिए जाएँ तो पैसा देने वाले के मनोनकूल ही समाचार बनाकर छापना होगा। एसी स्थिति में पत्रकारों के लिए उचित अनुचित सोचने विचारने, संपादन करने हेतु कोई स्थान नहीं रह जाता है। फिर 'पीत पत्रकारिता` जैसा श्ब्द और प्रेस की स्वतंत्रता (फ्रीडम ऑफ प्रेस) जैसी किसी विचारधारा का कोई माने ही नहीं रह जाता है। पत्र समूह के स्वामी जो लिखने हेतु जो मूल्य लेंगे वही प्रकाशित करना होगा चाहे वह समाज राप्ट्र के लिए हितकर हेा अथवा न हो। पत्रकारिता जगत में आज भी इतना तो मूल्य शेष है ही कि पत्रसमूह के प्रबंधन के उच्च पदस्थ पदाधिकारियों के द्वारा यदि किसी विशेष समाचार के प्रकाशन के लिए दबाव डाला जाय जो सम्पादक को अनुचित प्रतीत हो तो पत्रकार उसे अनुचित मानते हैं। कई परिस्थितियों में यह भी देखा गया है कि पत्रकार प्रकाशन समूह के प्रबंधन के विरुद्ध भी समाचार प्रकाशत करते हैं। यह स्वतंत्रता जिस दिन बिक गई या बेच दी गयी (जैसा कि उक्त लेख में प्रस्ताव है) तो पत्रकारिता अपनी विश्वसनीयता खो देगी और फिर मुफ्त में वितरित किए जाने वाले पत्रों को भी शायद जनता पढ़ने का जहमत न उठाए। अत: समाचारों को अधिकृत रूप से प्रायोजित करने की बात न तो व्यावहारिक है और नही उचित बल्कि ऐसा करना प्रकारान्तर से सम्पूर्ण पत्रकारिता केा गाली देने के समान है। प्रायोजित समाचारों का विचार करने में पाठक की बौद्धिकता को नजड़अंदाज किया गया है। लाखों पाठक के बीच चिस्वसनीय बनना और लोकप्रिय होना अत्यधिक कठिन उपलब्धि है। प्रकाशित समाचार, समाचार विश्लेपण, लेख सम्पादकीय सभी को पाठक अपने बुद्धि-विवेक की कसौटी पर तौलता रहता है। उसमें तनिक भी त्रुटि पत्र की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लगा देता है। यदि एक समाचार पत्र में प्रकाशित समाचार केा सत्यापित करने हेतु पाठक दूसरे समाचार पत्रों का सहारा लेने लगे तो समझना चाहिए कि पत्र की विश्वसनीयता कम हो रही है। इस प्रकार हर बड़े (प्रसार संख्या की दृप्टि से ) समाचार पत्र को निरंतर पाठकों के द्वारा ली जाने वाली अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ता है। और इस कार्य में कुशल सम्पादक के निर्देयान में सम्पूर्ण पत्रकार समूह को कठिन परिश्रम के साथ तटस्थता का प्रमाण पाठक को देते रहना पड़ता है। इस प्रकार पत्रकार नित्य प्रति अपनी लेखनी से समय के थपेड़ों का अहसास पाठक को कराते रहते हैं तथा इस क्रम में वे अपने समय का इतिहास भी दर्ज करते रहते हैं साथ ही समय की चेतना से जुड़कर उसे सम्यक दिशा और गति भी प्रदान करते हैं । अत: पत्रकारिता एक पवित्र, उत्तरदायित्वपूर्ण तथा सूक्ष्म बौद्धिक क्षमता की अपेक्षा रखता है। इसे स्थूल रूप में नहीं देखा जाना चाहिए जैसा कि आज कुछ तथाकथित नव्य बौद्धिकता के अनुशरणकर्ता कर रहे हैं।(निश्चय ही जिसमें कुछ पत्रकार भी हैं।) आज भी अधिकांश पत्रकारों को सम्मान की दृप्टि से देखा जाता है। किन्तु उन्हें भी अपनी जिम्मेदारियों का एहसास होना चाहिए । आखिर वे जनतंत्र के प्रहरी हैं। वे अपनी गरिमा को बनाए रखने में यदि असफल होंगे तो समाज के प्रति वह एक घोर अपराध होगा। मेरा तो कहना है कि समाचार प्रायोजित करना, करवाना तथा ऐसी योजनाओं को अम्लीजामा पहनाना और ऐसा प्रयोग करना अनैतिक तो है ही जनतंत्र के चौथे खम्भे को कमजोड़ करने की साजिश माना जायगा ।

Saturday, October 25, 2008

अल्प जन हिताय, अल्प जन सुखाय

अल्प जन हिताय, अल्प जन सुखाय
वे दिन लद गए जब बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय की बातें होती थी और उसे शासन के लिए भी आदर्श रूप में अपनाया जाता था। अधिक से अधिक लोगों का कल्याण हो, अधिक सें अधिक लोगों को सुविधा मिले, अधिक से अधिक लोग समृद्ध हो सकें। पर यह सब अब पुरानी बातें हैं। आज के दौड़ में यह भावना भी अन्य पारम्परिक सांस्कृतिक मूल्यों की तरह 'आउट डेट` हो गया है। आज के समाज के कर्ता धर्ता राजतितिज्ञ अब चौबीसों घंटे निर्लज्जता की सीमा पार कर अल्पजन हिताय, अल्पजन सुखाय की बाकलतें करते नहीं थकते। अल्पजन याने अल्पसंख्यक वह भी समग्र रूप से नहीं मात्र मुसलमान। अबतो अल्पसंख्यक कहने से भी नेताओं को सुतुष्टि नहीं मिलती बल्कि साफ-साफ मुसलमान कहना इन्हें अच्छा लगता है।पक्के तौर पर यह नहीं कहा जा सकता कि ये लुभावनी बातें मुसलमानों को भी पसन्द आता है अथवा नहीं ? पर इतना तो जरूर है कि वे इस मायाजाल में स्वत: फसते चले जाते हैं। जितने दिनों से तथाकथित धर्मनिर्पेक्ष पार्टियां अथवा नेता गण अल्पसंख्यकों के उद्धार की वकालत करते आ रहे हैं अगर वास्तव में वे इनके हितैशी होते तो इतने वर्षों में अलपसंख्यकों की सारी समस्याओं का निदान हो गया रहता और उससे आम जनों को भी कुछ सुविधाएं तो अवश्य ही मिलतीं। और तब नेताओं को आजतक अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए नारा नहीं बुलनंद करते रहना परता। 'माई` कम्बिनेसन के बदौलत स्त्तासीन लालू सरकार को अल्पसंख्यकों का कल्याण करते १५(प्रंद्रह) वर्ष बीत गए पर एक भी मुसल्मानों का कल्याण नहीं हो सका। आज भी कमो बेश मुसलमानों की स्थिति वही है जो आज से १५ साल पहले थी। बल्कि स्थिति विपरीत होती जा रहीं है। अल्पसंख्यकों को कोई फायदा हो न हो पर अल्पसंख्यकवाद के नारे इतने अधिक बुलन्द किए जा रहे हैं कि समाज के अन्य समुदायों के मन में उनके प्रति भीतर ही भीतर आक्रोश उत्पन्न हो रहा है। हमें यह पता नहीं चलता कि अल्पसंख्यक समुदाय के भाई लोग इस राजनीतिक दाघ्व पेंच को कैसे नहीं समझ पाते। क्या वे यह नहीं समझते कि तथाकथित धर्मनिर्पेक्ष रानितिज्ञों ने उन्हें उपयोग की वस्तु बना रखा है। चुनावों में मात्र वोट के लिए उनका उपयोग किया जाता रहा है और आज के 'यूज एण्ड थ्रो `संस्कृति की तरह ही काम निकाल कर फेक दिया जाता है। बार- बार ,रात-दिन ,चौबीसो घंटे उनके पक्ष में अनाप- शनाप झूठे लुभावने बयानबाजी कर वे मुसलमानों केा अपने जाल में फघसते रहते हैं और दूसरी ओर भारत के बहुसंख्यक हिन्दू समाज भीतर हीं भीतर अपनी उपेक्षा से दु:खी होते रहते हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि इसका परिणाम अच्छा तो नहींे ही हो रहा है। भारत के मुसलमान अपने हीं देश में अलग थलग पड़ते जाएघ्गे तथा मुख्य धारा से कटते जा रहे हैं। मुसलमान बुद्धिजीवी इन सच्चाइयों को समझते भी हैं। कुछ जागरुक नेताओं ने भी अपने उपयेाग किए जाने पर समय-समय पर घोर आपघि भी जताई है। पर वे भी उस तोंते की तरह जो -'श्किारी आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा, लाभ से उसमें फसना नहीं का रट लगाते हुए जाल में फस गया था ``- वे भी नेताओं के वाक्जाल, झूठे आश्वासनों के भ्रम में पड़े हैं।प्रश्न यह उठता है कि भारत के मुसलमानों केा सामान्य नागरिक की तरह जीने में क्या आपघि है ? क्यों वे विशेषाधिकार पाना चाहते हैं ? आखिर राज्य में विकास होगा सड़क बनेगा, बिजली, पानी, शिक्षा, चिकित्सा, की सुविधाएघ् उपलब्ध होंगे तो क्या उन्हें इसका लाभ नहीं मिलेगा ? क्या उन सड़कों पर केवल हिन्दू चलेंगे ? उन अस्पतालों में केवल बहुसंख्यकों का इलाज होगा ? क्या कानून व्यवस्था सुदृढ़ होने का लाभ उन्हेें नहीं मिलेगा ? अगर हाघ् तो वे समग्र विकास के नाम पर वोट क्यंो नहीं करते ? मुख्य धारा से जुड़कर आम समस्याओं पर उनका ध्यान क्यों नहीं जाता ? उनमें एकता की शक्ति है तो फिर वे इसका इस्तेमाल विकासोन्मुख सरकार की स्थापना में क्यों नहीं करते। यदि समग्र विकास होगा तो स्वत: वे भी विकसित होंगे। बाघ्टो और राजकरो नीति को हम क्यों प्रश्रय देते हैं। केवल मुसलमान ही नहीं हिन्दुओं ने तो अपनी पहचान हीं भुला रखी है। हजारों जातियों में बघ्टकर वे इस तथ्य को भूले बैठे हैं कि अपनी पहचान खोकर कभी सुखी नहीं रहा जा सकता और न प्रगति ही की जा सकती है। जिस प्रकार अल्पसंख्यकों को कोई फायदा नहीं हो पा रहा है, बल्कि राजनीति में पार्टियाघ् अपने फायदे के लिए उनका नाजायज स्तेमाल कर रही हैं। उसी प्राकार विभिन्न जातियों में विभाजित हिन्दुओं का भी उपयांेग ही होगा।अत: फायदा तो इसी में दिखता है कि सब मिलकर इन मायावी मक्कार नेताओं को पुन: बहुजन हिताय बहुजन सुखाय के नारे बुलन्द करने को मजबूर करें जिससे सबको फायदा हो सके । मुसलमान भाइयों को भी तभी लाभ होगा जब समग्र विकास होगा। रहना उन्हें भी इसी समाज में है। खुले मन से सेाचें, अपने विवेक का उपयोग करें और अपना इस्तेमाल वे दूसरे के स्वार्थ के लिए न होने दें।